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Archive for the ‘मन के गुब्बारे...’ Category

I love train journeys.
It might be because I’m a lazy, laid-back person and like to do things at my own (slow) pace. I love ‘travelling’ more than ‘arriving’. I don’t like it, when a book ends because it forces me to come back to the real world. Probably, if I had a girlfriend, she’d have [...]

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भीड़ के अगणित चेहरों में कितनों को पहचाना है…
कितनों को अपना माना है!
रंग मंच पर कितने लम्हे, किसने किसके साथ बिताए…
कौन गया है अभी निकल कर…
मस्त समय का अंकुश थामे?
क्यों लगते हैं थके-थके से
मद्धम पड़ते कुछ अफ़साने?
कहाँ गिरे हैं लाखों टुकड़े…
उन सपनों के जो उड़ न पाए!
शब्द चुराए किस जालिम ने…
दर्द कंठ से उभर न [...]

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 बरस रहे अम्बर के बदरा…
तरस रहे पर प्यासे अधरा!
जाने कब अंतर्मन के घन इनकी तृषा बुझाएंगे
जाने कब मन में बादल जीवन बौछार गिरयायेंगे!
उस ओर देख,
वहाँ बंधे हुए हैं मन के ढेरों गुब्बारे…
नर्म फर्श पर बिछे हुए हैं सपने कितने सारे!
हाथ थाम कर आँख मूँद लूँ
बोलो इतना कर पाओगे…
खोलोगे गुब्बारे, सपने मुझे दिखाओगे?

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