भीड़ के अगणित चेहरों में कितनों को पहचाना है…
कितनों को अपना माना है!
रंग मंच पर कितने लम्हे, किसने किसके साथ बिताए…
कौन गया है अभी निकल कर…
मस्त समय का अंकुश थामे?
क्यों लगते हैं थके-थके से
मद्धम पड़ते कुछ अफ़साने?
कहाँ गिरे हैं लाखों टुकड़े…
उन सपनों के जो उड़ न पाए!
शब्द चुराए किस जालिम ने…
दर्द कंठ से उभर न आए!
मृत फूलों के शाख से रिश्ते, मौसम बदले फिर खिल सकते हैं?
उन लोगों को कहाँ पुकारूँ, किस बस्ती में मिल सकते हैं?
अंजलि: एक क्षणिक कविता, जो दिल को छूकर शब्दों के भूलभुलैया में कहीं खो गई! क्या जीवन के किसी मोड़ पर तुमसे फिर मुलाकात होगी?
मालुम नहीं कहां का दर्द छुपा है। अच्छी कविता है हिन्दी में और भी लिखिये
दर्द किस बात का है, दोस्त ये पूछ नहीं…
जो मेरे सब कुछ हैं, उनका मैं कुछ भी नहीं!
प्रशंसा के लिए धन्यवाद| लिखता रहूंगा!