बरस रहे अम्बर के बदरा…
तरस रहे पर प्यासे अधरा!
जाने कब अंतर्मन के घन इनकी तृषा बुझाएंगे
जाने कब मन में बादल जीवन बौछार गिरयायेंगे!
उस ओर देख,
वहाँ बंधे हुए हैं मन के ढेरों गुब्बारे…
नर्म फर्श पर बिछे हुए हैं सपने कितने सारे!
हाथ थाम कर आँख मूँद लूँ
बोलो इतना कर पाओगे…
खोलोगे गुब्बारे, सपने मुझे दिखाओगे?
Sirji yeh aapne likhi hai ?