मिटटी का तन, मस्ती का मन, क्षण भर जीवन…
मेरा परिचय!
- बच्चन
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यह कोई मामूली शब्द नहीं,
क्रांति का फरमान लिखा है!
इन पन्नों पर स्याही से, इक परवाने का अरमान लिखा है!
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शरारा फूँक कर मेरे माझी का वो सोचते हैं अब…
जल गया सब! जल गया सब! जल गया सब!
क्या बात है! बहुत दिनों के बाद हिन्दी में कुछ अच्छा पढ़ा. ‘गुब्बारे’ कविता बहुत अच्छी लगी. मैं कविता तो नही लिखता लेकिन यह ब्लॉग पढ़कर मुझे भी हिन्दी में लिखने का मन कर रहा है
मेन पेज पर ख़ुद उतारी हुई फोटो लगाने का आईडिया भी बहुत बढ़िया है.
आभारी हूँ!
gud,
bahut achi lines hai